कहीं कोई पूर्वाग्रह तो नहीं ?
हिंदी के प्रति लोगों की उदासीनता कहीं न कहीं मन में चुभती है। इस संदर्भ में अगर हम राष्ट्र स्तर पर बात करें तो कोई भी देश चाहे वह छोटा हो या बड़ा, उसकी पहचान के लिए उसे एक नाम और भाषा की जरुरत होती है जिसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया जाता है, जो सम्पूर्ण विश्व में उस देश के नागरिकों की पहचान बनती है कि ब्यक्ति इस देश का नागरिक है, जहाँ कि राष्ट्रभाषा ये है।
जब देश की अखण्डता पर आँच आती है, उस समय हममें से हर एक कहीं न कहीं, चाहे घर हो या सार्वजनिक स्थान, अपनी आवाज बुलंद कर, यह दिखाता है कि संकट की इस घड़ी में हम एक हैं, एकजुट हैं, देश के साथ हैं और यह करने के बाद, हमें यह लगता है कि देश के लिए हमने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया।
परिस्थिति जटिल हो या सामान्य, एकता बनाये रखना हर हाल में उचित है, लेकिन सिर्फ कोरी बयानबाजी से कुछ नहीं होने वाला, ठीक वैसे ही जैसे किसी परिवार पर कोई आपदा आने पर परिवार के सदष्य, उससे बाहर निकलने के लिए, कोई ठोस कदम न उठाकर, सिर्फ कोरी बयानबाजी में लगे रहें।
जानकर या अनजाने में, कम से कम भाषा के मामलें में, यह हम किस तरह करते हैं, देखते हैं ---
1. हम जिस भी धर्म या राज्य के हैं, उससे जुड़ी क्षेत्रीय भाषा में (जैसे बंगाली, पंजाबी, गुजराती, आदि) में बात करने में हमें कोई झिझक महसूस नहीं होती है।
2. भाषा के प्रयोग को लेकर, यदि हम अपने को थोड़ा ऊपर ले जाते हैं तो फिर सीधे अंग्रेजी भाषा पर पहुँच जाते हैं।
3. भाषा के चयन में, इस शुरू और अंत के बीच, हिंदी को कोई स्थान नहीं मिल पाता है, ऐसा क्यों ?
जानकर या अनजाने में, कम से कम भाषा के मामलें में, यह हम किस तरह करते हैं, देखते हैं ---
1. हम जिस भी धर्म या राज्य के हैं, उससे जुड़ी क्षेत्रीय भाषा में (जैसे बंगाली, पंजाबी, गुजराती, आदि) में बात करने में हमें कोई झिझक महसूस नहीं होती है।
2. भाषा के प्रयोग को लेकर, यदि हम अपने को थोड़ा ऊपर ले जाते हैं तो फिर सीधे अंग्रेजी भाषा पर पहुँच जाते हैं।
3. भाषा के चयन में, इस शुरू और अंत के बीच, हिंदी को कोई स्थान नहीं मिल पाता है, ऐसा क्यों ?
क्षेत्रीय भाषा के अधिकाधिक प्रचलन की वजह तो प्राकृतिक है, क्यूँकि बचपन से ही हम अपने परिवार तथा सामाजिक परिवेश में, उसी भाषा के दायरे में पलते बढ़ते हैं। लेकिन अंग्रेजी के बारे में क्या ? कुछ लोग कहेंगे कि आज के समय व हालात के हिसाब से, अगर हमें दुनियाँ की प्रतिस्पर्धा में टिकना है, तो अंग्रेजी भाषा को प्रयोग में लाना ही होगा, चलिए मैं कुछ हद तक इस बात को मान लेता हूँ, लेकिन जापान जैसे देशों का क्या ? क्या वो दुनिया की प्रतिस्पर्धा में टिके नहीं हैं ? या हमसे पीछे हैं ?
वास्तविकता यह है कि अपनी मानसिक अपंगता की वजह से हम क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के बीच, हिंदी को नहीं आने देते हैं, जबकि यह दोनों बातें हम अच्छी तरह जानते हैं कि---
1. अलग अलग कारणों से, कोई भी क्षेत्रीय भाषा, राष्ट्रभाषा की जगह नहीं ले सकती
1. अलग अलग कारणों से, कोई भी क्षेत्रीय भाषा, राष्ट्रभाषा की जगह नहीं ले सकती
2. और कुछ पूर्वाग्रहों की वजह से हमें अंग्रेजी की लत लग चुकी है।
वैसे भी किसी भी चीज की लत लग जाये तो जल्दी छूटती नहीं है, क्यूँकि किसी चीज की लत, मानसिक अपंगता का ही एक रूप है, जिसे यदि जल्दी या जबरदस्ती छुड़ाने की कोशिश की जाये तो उसके दुष्प्रभाव तुरंत दिखाई देने लगते हैं। हिंदी के बारे में इसको इस तरह से कह सकते हैं कि हमें हमारा क्षेत्रीय आस्तित्व ही खतरे में नजर आने लगता है, नतीजा हड़ताल, प्रदेश बंद और तोड़-फोड़ के रूप में दिखाई देता है।
लत लगने वाली बात से कुछ लोग सहमत नहीं होंगे, जबकि है ऐसा ही, उदाहरण के रूप में देश के हिंदी सिनेमा जगत के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े, मशहूर हस्तियों को देखिये, वो अपने दर्शकों के लिए पूरी जिन्दगी, हिंदी में काम करते हैं लेकिन हिंदी में किये गए उस कार्य की वजह से, उन्हें सम्मानित करने के लिए, जब किसी मंच पर बुलाया जाता है तो उनमे से अधिकांश, उन भावुक पलों में अपने उद्गार, अपने विचारों को, अंग्रेजी में ब्यक्त करने लगते हैं, उस समय क्या उन्हें याद नहीं रहता है कि जिस कार्य के लिए उन्हें सम्मानित किया जा रहा है उनका वह पूरा कार्य किस भाषा में है ? उनके दर्शकों ने किस भाषा में उसे पसंद किया है ? हिंदी के प्रति यह पूर्वाग्रह या मानसिक अपंगता नहीं है तो और क्या है ?
No comments:
Post a Comment